धान का ब्लास्ट रोग:-

धान का ब्लास्ट रोग होने के कारण:-
किसान भाईयों धान में ब्लास्ट रोग के लक्षण फफूंद, मैग्नापोर्थे ग्रिसिया के कारण होते हैं, जो धान के सबसे विनाशकारी रोगों में से एक है। उच्च नाइट्रोजन या कम सिलिकॉन वाली मिट्टी में की गई धान की खेती में इस रोग की संभावना अधिक होती है।
धान की फसल में ब्लास्ट रोग की पहचान:-
धान का ब्लास्ट रोग ऐसे हर-एक भाग को प्रभावित करता है जो कि जमीन से ऊपर होता है। पत्ती, कॉलर (जिसे मूल संधि भी कहते हैं।), गांठ, गर्दन, मंजरी के हिस्से, और कभी कभी पत्तियों के खोल पर भी इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इसके होने पर पत्तियों पर पीले से लेकर हल्के हरे हरितहीन आंख के आकार के नुकीले किनारों वाले धब्बे दिखाई देते हैं। और जैसे-जैसे इस रोग के घाव बढ़ते हैं तो वैसे-वैसे पत्तियां सूखने लगती हैं।
धान के ब्लास्ट रोग की रोकथाम:-
यदि उपलब्ध हो तो सदैव ही जैविक उपचार करें। लेकिन यदि आप रासायनिक उपचार करना चाहते हैं तो आप कवकनाशी [किटाजीन (kitazin) 48EC] का प्रयोग कर सकते हैं।
01 हेक्टेयर खेत के लिए 500 मिलीलीटर का प्रयोग करना चाहिए। आप अपने 20 लीटर टंकी-पम्प के लिए 20 मिलीलीटर का प्रयोग करें। और इस प्रकार से अपने 01 हेक्टेयर खेत में 25 टंकी भरकर डालें।
धान के खोल में धब्बे (ब्लाइट) वाला रोग:-

धान में ब्लाइट रोग होने का कारण:-
धान के खोल में धब्बों के लिए उचित स्थिति 28 डिग्री से 32 डिग्री का उच्च तापमान, नाइट्रोजन उर्वरकों का उच्च स्तर और 85 से 100 प्रतिशत की सापेक्ष आर्द्रता है। और बरसात के मौसम में इस रोग का खतरा और बढ़ जाता है। एक बार धान के पौधे के सम्पर्क में आने पर कवक पत्तियों के खोल में प्रवेश कर जाता है।
धान की फसल में ब्लाइट रोग की पहचान:-
ब्लाइट रोग के प्रारंभिक लक्षण में जल की सतह के समीप छिलकों या कह सकते हैं खोल पर घाव हो जाते हैं। ये घाव अंडाकार, हरापन लिए हुए भूरे रंग, 01 से 03 सेन्टीमीटर लम्बे और पानी से भरे हुए होते हैं। ये घाव बहुत ही असमान रूप से बढ़ते हैं। और साथ ही साथ पौधे की सतह पर कवकीय फुंसियां बन जाती हैं। इस रोग के होने पर पूरा पौधा मर भी सकता है।
धान के ब्लाइट रोग की रोकथाम:-
यदि हो सके तो जैविक विधियों का ही प्रयोग करें। लेकिन अगर आप रासायनिक विधियों का प्रयोग करना चाहते हैं तो आप [थाइफ्लूजमाइड (Thifluzamide) 24.0 SC] का प्रयोग कर सकते हैं।
01 हेक्टेयर खेत के लिए 375 मिलीलीटर का प्रयोग करना चाहिए। अपने 20 लीटर टंकी-पम्प के लिए 15 मिलीलीटर का प्रयोग करना चाहिए और इस प्रकार से अपने 01 हेक्टेयर खेत में 25 टंकी भरकर डालें।
धान में तने की सड़न:-

धान में तने की सड़न होने के कारण:-
यह रोग मेग्नापोर्थे सेलविनाई कवक के कारण होता है। जब यह कवक पत्तियों पर उतरते हैं तो सतह से चिपक जाते हैं और एक कीटाणु नली बना देते हैं, जो पत्तियों की बाहरी परत में छेद कर देती हैं।
धान की फसल में तने की सड़न रोग की पहचान:-
किसान भाईयों अधिकतर इसके लक्षण किल्ले निकलने के चरण के बाद नजर आते हैं। शुरूआत के लक्षणों में पानी के स्तर के पास पत्ती की बाहरी सतह पर छोटे, असमान काले घाव होते हैं। और जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, तो वैसे-वैसे घाव भी बढ़ने लगते हैं।
धान में तने की सड़न रोग की रोकथाम:-
यदि उपलब्ध हो तो जैविक तरीकों से रोकथाम करें। लेकिन अगर आप रासायनिक तरीकों से नियन्त्रण करना चाहते हैं तो आप रोकथाम के लिए [मैनकोजेब (mancozeb) 75.0 WP] का प्रयोग भी कर सकते हैं।
01 हेक्टेयर खेत के लिए 1.8 किलोग्राम का प्रयोग करना चाहिए। अपने 20 लीटर टंकी-पम्प के लिए 56 ग्राम का प्रयोग करना चाहिए। और इस प्रकार आप अपने 01 हेक्टेयर खेत में अपनी टंकी को 31.5 बार भरकर डालें।
धान में खोल की सड़न रोग:-

धान में खोल की सड़न रोग होने का कारण:-
धान में खोल की सड़न रोग मुख्य रूप से बीजों द्वारा फैलता है यह रोग मुख्यत: सेरोक्लेडियम ऑरिजे नामक कवक के द्वारा फैलता है। यह फफूंद धान की फसल के अवशेषों में कटाई के बाद में पनपता है।
धान में खोल की सड़न रोग की पहचान:-
किसान भाईयों इस रोग के होने पर मंजरियो को घेरने वाली पत्तियों पर लंबाकार से लेकर असमान धब्बे (0.5 से 1.5) प्रारंभिक अवस्था में दिखाई देते हैं। इन धब्बों की विशेषता भूरे केन्द्र तथा कत्थई किनारे होते हैं। इसका संक्रमण सबसे ज्यादा बूटिंग अवस्था में होता है।
धान में खोल की सड़न रोग की रोकथाम:-
यदि उपलब्ध हो सके तो जैविक चीजों का ही उपयोग करें, लेकिन अगर आप रासायनिक उपचार करना चाहते हैं तो आप हेक्साकोनाजोल [(Hexaconazol) 75.0 WG] का प्रयोग भी कर सकते हैं।
01 हेक्टेयर खेत के लिए 66 ग्राम का प्रयोग करें। और अपने 20 लीटर टंकी-पम्प के लिए 03 ग्राम का प्रयोग करें। और अपने 01 हेक्टेयर खेत के लिए 25 टंकी भरकर डालें।
धान की पत्तियों का झुलसा रोग:-

धान की पत्तियों के झुलसने के कारण:-
इस रोग का विकास प्रायः मौसम में देर से विकसित पत्तियों पर होता है और नमी के मौसम में, नाइट्रोजन उर्वरकों की ज्यादा मात्रा और पौधों के बीच की कम जगह इस रोग बढ़ने में सहायक होती है। इसके संक्रमण का स्रोत बीज और पिछली वाली फसल के अवशेष होते हैं।
धान की पत्तियों के झुलसा रोग की पहचान:-
किसान भाईयों पत्तियों के झुलसने के रोग से जुड़े लक्षण विकास के चरण, किस्म और पौधों के घनत्व के अनुसार बदलते हैं। इस रोग के घावों के लगातार बढ़ने के कारण से पत्तियों का एक बड़ा हिस्सा झुलस जाता है। इससे प्रभावित क्षेत्र झुलस जाते हैं जिसके कारण पत्तियां पाले से ग्रस्त दिखाई देने लगती हैं।
धान की पत्तियों के झुलसा रोग की रोकथाम:-
यदि उपलब्ध हो सके तो जैविक उत्पादों का ही प्रयोग करें, लेकिन अगर आप रासायनिक उत्पादों का प्रयोग करना चाहते हैं तो [जिनेब (Zineb) 75.0 WP] का प्रयोग भी कर सकते हैं।
01 हेक्टेयर के लिए 1.1 किलोग्राम का प्रयोग करें। और अपने 20 लीटर टंकी-पम्प के लिए 45 ग्राम का प्रयोग करें। और आप अपनी टंकी को 25 बार भरकर डालें।
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